जीवन के उलझे प्रतिमान
जीवन के उलझे-उलझे प्रतिमानों से,
आहट देती आती काली चट्टानों से।
कुछ तो धराशायी होगा, आते हुए तूफानों से,
पता चले क्या निकलेगा रिश्तों के खदानों से।
बदलेगा पर दृश्य अगर, संभव है छल-बल होगा।
मैं अब नहीं बाट निहारूंगा, होने को हलचल होगा।।
उजाड़ बनेगा जीवन, प्रतिद्वंद्वी समय बनेगा,
उलझन की बगिया खिलने से मन में द्वंद्व ठनेगा।
मैं लड़ने को आतुर हूँ, दुविधा के दल-बल से।
लड़ लूँ तो संभव है, आता तूफानी वेग थमेगा।
स्वयं का मोल पता चल जाए, मीठा प्रतिफल होगा।
मैं रण में हूँ शंख बजाऊँगा, होने को हलचल होगा।।
धारा जीवन का धसमस-धसमस वेगवान जो होगा,
मैं मथ डालूँगा उन प्रश्नों को, कोई तो उत्तर होगा।
अभी संभल जो जाऊँ, संभव है नहीं मिलेगा धोखा,
वही वीर कहलाता है, जिसने समय वेग को रोका।
मैं अपने द्वंद्व से रार करूंगा, आगे सब उज्वल होगा।
रणभूमि में शोणित धार बहाऊँगा, होने को हलचल होगा।।
मैं कोरे प्रतिबिंब में जो उलझा, खुद से अंजान बनूँगा,
जीवन की दरिया लहरें लेगी, फिर तो बेजान बनूँगा।
शायद ऐसा संभव हो जाए, खुद का ही मेहमान बनूँगा,
लड़ लूँगा जो इस दुविधा से, तो ही इंसान बनूँगा।
मैं अपना कर्तव्य निभाऊँगा, मेरा वस्त्र भी वल्कल होगा।
उपमानों का सभागार भी फूँकूंगा, होने को हलचल होगा।।
जीवन के उलझे प्रतिमान कभी अपने सगे नहीं हैं,
जीवन की बगिया देखा हूँ, कुसुम भी लगे नहीं हैं।
जब देखा पथ पर कई काफिला, कोई जगे नहीं है,
मैं अब तक तो सुलझा हूँ, दुविधा ने ठगे नहीं है।
कर लूँगा प्रेरित होकर उपाय, जीवन जल निर्मल होगा।
मैं रणभूमि के नियमों को तोड़ूँगा, होने को हलचल होगा।।
