नियमों को आलिंगन कर लो

नियत की अभी-अभी तो बातें छोड़ो,
कड़ियों को कड़ियों से मिला कर जोड़ो ।
कहीं भ्रमित जो हो जाओ, दीप जलाओ,
चिन्ता की चिता सजी-धजी, आग लगाओ।

आओ पथ पर, मानव मूल्य संवर्धन कर लो।
हो प्राणी जीवन के, नियमों को आलिंगन कर लो।।

माना अभी रात है, अँधियारा पथ पर होगा,
तुम अगर हौसला कर लो, बढने से किसने रोका।
लगता है प्रश्न अनुत्तरित है बचे हुए कई,
पर तुम धैर्य ना खोना, मंजिल फिर तेरा होगा।

संवर्धित कर लो मनोभाव, परिवर्तन कर लो।
तुम मानव हो महारथी, नियमों को आलिंगन कर लो।।

भ्रम के भाव में जीना क्या, जो पथ पर भ्रमित करें,
तुम जख्मों को तो भूलो, नहीं तो होंगे हरे-भरे।
क्या तुमको हुआ बताओ भी, क्यों हो ऐसे डरे-डरे,
संभव भी तो नहीं है हासिल करना, यूँ ही परे-परे।

तुम सोचो-जरा संभलो, मनोभाव का मंथन कर लो।
अभिलाषा कर भी लो, नियमों को आलिंगन कर लो।।

वृथा ही तोल-मोल में, समय को नहीं व्यर्थ गंवाओ,
अभी तो मंजिल दूर-दूर है, धैर्य जरा दिखलाओ।
अब क्यों अटके हो किस चाह में, खुद ही बोझ उठाओ,
निर्मल बन जाओ पथ के पथिक, सूझ-बूझ बतलाओ।

अपने कर्म का अपने धर्म से, उचित अनुबंधन कर लो।
आहत क्यों होते हो, नियमों को आलिंगन कर लो।।

नियत का क्या, यह समय के संग ही चलता है,
तुम समझोगे कैसे, समय-समय पर रंग बदलता है।
उत्तर दाई तो नहीं है ये, समय के अनुरूप ही ढलता है,
कोई तो रंग-रुप नहीं है इसका, ये स्वभाव में पलता है।

तुम छोड़ो भी बहकी-बहकी बाते, अभी चिंतन कर लो।
अधीर न होना पथ पर ऐसे, नियमों को आलिंगन कर लो।।