आस लगाए बैठे हैं अर्चना राठौर याद नहीं कब से हम तेरे इंतजार में दरपे आस लगाए बैठे हैं।बस एक तुम्हारे दीदार के लिए ही हम महफ़िल सजाए बैठे हैं।कभी तेरा ये नज़र-ओ-करम इस कनीज की रूह पे पड़ जाए,न हो रोशनी की कमी इसीलिए चिरागदिल का जलाए बैठे हैं।