एहसास की डोर
कैसा सभ्य समाज है ये, और इनकी ये शिष्टता कहाँ चली,
सारा आवाम दर्द से चुप है, खामोशियाँ पसरी गली गली।
महाबलियों को लूट की छूट है कमीशनखोरी का खेल है,
बँधते एहसास की डोर से, इनकी आँखें झुक जाती भली।
चीखती पुकारती कही ये बेटियां, निशब्दता को है भेदती,
पुकारती कोई मेरी मदद करो, इंसानियत जाने कहाँ चली।
न रुक के देखता हाल, इनके लिए खयाल जुदा है फिर भी,
पुकार मची है चारो तरफ, ज़मीर में क्यों न मची खलबली।
चंद सिक्कों में पुलिस बिक रहे, अदालत भी खड़ी मौन है,
सभ्यता का कोई मापदंड नहीं, राजनेता जहाँ अच्छी भली।
वहशियत भी इनकी देखिए, खड़े है मानवता की लाश पर,
सच बात हमने कह दिए, न जाने किसकी पिछवाड़ा जली।
