क्यों तड़पती मैं सारी रात अर्चना राठौर क्यों तड़पती मैं सारी रात तुमसे मुलाकात न होतातेरा गठीला बदन से रूबरू गर इत्तेफाक न होता।मैं भी जी लेती बिंदास जिंदगी सोती चैन की नींदअगर मेरी इन पलकों में तेरा कोई ख्वाब न होता।तुमने अपनी आँखों में सुनहरा सा पहना जो ऐनकतुम्हें देख तुमको पाने की चाहत बेहिसाब न होता।न तड़पता बेचारा दिल न बेबस आँखें आँसू बहातीन मरती तेरे इश्क में जिंदगी में तेरा आगाज़ न होता।मैं ख्वाहिश ही क्यों करती तेरा दिल की निगाहों से,लोगों को अपना बनाने का हुनर लाजवाब न होता।