रोज़ आती हो क्यों

रोज़ आती हो क्यों मुझे ख़्वाब में सताने के लिए,
कभी तो चली आओ मुझसे दिल लगाने के लिए।

जब से तेरे चाँद सी सूरत का मैंने है दीदार किया,
रोज़ बहकते हैं कदम मेरे तेरे पास जाने के लिए।

सुबह से लेकर शाम तक तड़पता हूं तेरी यादों में
रास्ते तू बता कैसे मुमकिन है तुम्हें पाने के लिए।

हम तुझ पे अपना दिलो जान भी कुर्बान कर देते
एक नज़र इनायत कर देते हमें आज़माने के लिए।

तेरे दर पे जाने के लिए मैंने कभी न फ़ासला रखा
मेरा इश्क़ तो तुम्हारे लिए है न कि ज़माने के लिए।