मदन मोहन 'मैत्रेय'

मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

लावण्य प्रेम (भाग-3)

बाहर शाम का धुंधलका घिरने लगा था। परंतु कहते हैं न, शहर के दिन–रात में कोई विशेष फर्क नहीं होता। ऐसे में यह गाँव सुजातपुर, जो दिल्ली के क़रीब था, बिल्कुल शहरी जीवन जैसा ही लगता था। किन्तु मालती, जो शहरी परिवेश में पली-बढ़ी थी, उस पर शहरी जीवन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। तभी तो कॉलेज से अभी-अभी आई थी—बैग हॉल के किनारे पर रखा, वॉशरूम में जाकर हाथ-पैर धोए और फिर हॉल में आकर सभी लाइटें एक साथ जला दीं। इसके बाद पूजा-घर में गई, धूप–दीप जलाया और बंगले के बाहर निकलकर तुलसी के पौधे के नीचे दीप रख आई। फिर वापस हॉल में लौट आई। तब तक उसकी माँ लता देवी किचन से निकलकर आईं और उसे देखते ही मुस्करा पड़ीं। क्योंकि लता देवी को अपनी बेटी से अत्यधिक स्नेह था। उनका एक पुत्र दिवांग भी था, परंतु मालती के प्रति उनका स्नेह कुछ अधिक था—और यह अधिक इसलिए था क्योंकि मालती अनुशासनप्रिय थी। वह उतना ही कार्य करती थी, जितना पारिवारिक मर्यादा की सीमा में उचित हो। यही कारण था कि लता देवी का स्नेह उसके ऊपर स्वाभाविक रूप से उमड़ पड़ता था। पचास वर्षीय लता देवी संभ्रांत महिला थीं—गौर वर्ण, सधा हुआ व्यक्तित्व, लंबी घनी केश-राशि जो अब कुछ-कुछ श्वेत होने लगी थी, और चेहरे पर शांत, कांतिमय आभा तथा चिर-परिचित मुस्कान। बेटी को सामने देखकर उनकी मुस्कान और गहरी हो गई। उन्होंने स्नेह-भीगे स्वर में कहा—
“आ गई बेटा?”
“हाँ मम्मा! आ गई हूँ… और हाथ-पाँव धोकर अपना दैनिक कार्य भी कर लिया है। यानी ईश्वर की आराधना भी कर चुकी हूँ।”
वह बोल पड़ी। एक पल रुकी, उनकी आँखों में देखा और आगे बोली—
“बस मम्मा… अब एक कप गरम-गरम कॉफी बना दो न, ताकि थोड़ी थकावट दूर हो जाए।”
उसकी बात सुनकर लता देवी झट बोलीं—
“बस, तू दो मिनट टीवी खोलकर देख। तब तक मैं कॉफी बनाकर ले आती हूँ।”
कहकर वे मुड़कर किचन में चली गईं। मालती उन्हें जाते हुए देखती रही—जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गईं। फिर अनायास ही मुस्करा पड़ी। यह मुस्कान ऐसे ही नहीं थी—यह वह मुस्कान थी जो माँ के उमड़ते प्रेम को देखकर उसके भीतर स्वतः खिल जाती थी।उसे भलीभाँति महसूस होता था कि माँ उससे, शायद पिताजी से भी अधिक प्रेम करती हैं। क्योंकि पिताजी का झुकाव भाई की ओर अधिक था—इस बात का उसे कई बार अनुभव हो चुका था।वैसे उसका मानना था कि पारिवारिक ढाँचे में पिता का झुकाव पुत्री की ओर और माता का झुकाव पुत्र की ओर अधिक रहता है। परंतु उनके परिवार में मामला उलटा था—पर कोई बात नहीं।
उसके लिए इतना ही काफी था कि माँ उससे अधिक स्नेह करती हैं। यही सोचकर उसके होंठों पर मुस्कान खिल उठती थी।खैर, उसने मन में उठे विचारों को झटका और सोफे पर बैठकर टेबल से रिमोट उठाया और टीवी चालू कर लिया। यह उसका रोज़ का रुटीन था—रोज़ ही वह कुछ देर समाचार देखती थी। वह मानती थी कि देश-दुनिया की खबरों से अपडेट रहना आवश्यक है।
हालाँकि रोज़ चैनलों पर नेताओं की तू-तू-मैं-मैं उसे खलती थी, इसलिए हमेशा वही चैनल लगाती थी जिनकी खबरें भरोसेमंद हों। आज भी उसने वही किया।
तभी हॉल में किसी के आने की पदचाप उभरी। स्वाभाविक था, उसकी एकाग्रता टूटी। उसने मुख्य द्वार की ओर देखा—जहाँ से पीतांबर बाबू हॉल में आए थे। उसके पिता—ऊँचा कद, सधा हुआ शरीर, सिर पर घुँघराले बालों में हल्की सफेदी, और गोल चेहरे पर सुंदर मूंछें। व्यक्तित्व में सब कुछ था जो उन्हें संभ्रांत बनाता था, पर न जाने क्यों वह अपने पिता को अपना आदर्श नहीं मान पाती थी। शायद इसलिए कि उनका व्यवहार उसके साथ हमेशा औपचारिक ही रहा था। उसने एक बार उनकी ओर देखा और फिर टीवी की ओर दृष्टि टिकाकर बैठ गई।
पीतांबर बाबू ने उस पर एक उचटती नजर डाली और सीधे वॉशरूम की ओर बढ़ गए।
उनका इस तरह अनदेखा कर देना उन्हें रोज़ की तरह कचोट गया—किन्तु उन्होंने अपने भाव भीतर ही छिपा लिए। वे जानते थे यह दूरी क्यों आई है।
उन्होंने बचपन से ही उसके साथ कठोर अनुशासन रखा था—सीमा पार न हो, इसलिए स्नेह को भी सीमित कर दिया था। परिणाम–संबंध हाशिए पर चला गया, जो अब उनके हृदय में शूल की तरह चुभता था। पर अब कुछ बदला नहीं जा सकता था।
उन्होंने इन विचारों को झटका और फ्रेश होने लगे।
इधर मालती समाचार देखने में तल्लीन थी। तभी लता देवी कॉफी लेकर आईं और सेंटर-टेबल पर रखकर वापस किचन लौट गईं। कॉफी देखकर उसकी तलब जाग उठी। उसने कप उठाया और धीरे-धीरे पीने लगी।तभी उसके मोबाइल की बीप बजी। स्क्रीन पर देखा—अनजान नंबर था। फिर भी उसने कॉल रिसीव किया।जैसे ही उधर से शब्द कहे गए—वह सिहर उठी।
आश्चर्य और भय का मिश्रित झटका उसके भीतर दौड़ गया। हाथ काँप उठे—कप गिरते-गिरते बचा।उधर से जो कहा गया था—वह उसके लिए किसी बम-धमाके से कम नहीं था।
जिसकी कल्पना तक नहीं की थी—ऐसी ख़बर मिली थी।
कुछ ही पलों में उसने खुद को सँभाला। टीवी बंद किया, कॉफी दो घूँट में ख़त्म की और तेज़ी से उठ खड़ी हुई।उसे तुरंत बाहर जाना था—और इसके लिए उसे पहले माँ से अनुमति लेनी थी।
इसीलिए वह तेज़ कदमों से किचन की ओर बढ़ गई।