मदन मोहन 'मैत्रेय'

मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

लावण्य प्रेम (भाग-4)

फार्म हाउस के अंदर बने हुए तालाब में प्रितेश की लाश तैर रही थी, और वे पाँचों लड़के भय से आकुल-व्याकुल होकर तालाब के किनारे खड़े थे। वे पाँचों—जो कुछ पल पहले तक मकान के अंदर जाम छलका रहे थे और मौज–मस्ती में डूबे थे—अभी कुछ ही देर पहले प्रितेश को अपने साथ देख रहे थे। वह भी तो उनके साथ ही था, उनके साथ ही मनोयोग से हँस-हँसकर मस्ती कर रहा था।
लेकिन अचानक वह कुछ पल पहले उनके बीच से गायब हो गया। जब उसने दिखाई नहीं दिया, तो वे बेचैन होकर उसे ढूँढ़ने लगे। उन्हें क्या पता था कि कुछ ही देर बाद उन्हें इस भयावह परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा—और उनका अजीज़ दोस्त इस तरह एक निर्जीव देह बनकर तालाब में तैरता हुआ मिलेगा।
जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, वही हुआ था। इस वजह से पाँचों के हलक भय से सूखते जा रहे थे। मौत का डर उनके चेहरों पर पीली जर्द परत बनकर फैल चुका था। मामला गंभीर था, और इस स्थिति में कानून की नज़र में प्रथम सस्पेक्ट वही लोग थे। इसलिए आगे क्या होने वाला है, यह सोचकर वे भीतर ही भीतर भय से जकड़े खड़े थे।जैसे ही वे बाहर आए और लाश को पानी में तैरते हुए देखा, तभी शिशिर ने हिम्मत जुटाकर पुलिस को फोन कर दिया और पूरी स्थिति की जानकारी दे दी। वह भी बाकी चारों के साथ तालाब के भीतर एकटक देखने लगा—उस तालाब को, जो मनोरंजन के लिए बनाया गया था, लेकिन आज उनके लिए मुसीबत बन चुका था।
“यार शिशिर!… अचानक ऐसा क्या हुआ कि अपना यार प्रितेश ने इस तरह से जल-समाधि ले ली?”
विप्लव ने कहा और चारों के चेहरे की ओर देखने लगा। उसकी बात सुनते ही भय के साथ-साथ नाराज़गी भी उनके चेहरे पर उभर आई। उसने तुरंत खुद को संभाला और संयत होकर बोला—
“यार, मैं भी न… इस अचानक हुई घटना से सकते में हूँ, इसलिए ऐसा बोल गया। पर सोचने वाली बात तो है… आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि अभी उसकी लाश तालाब में तैर रही है?”
“तुम्हें मालूम करना है न, विप्लव?”—उसके सवाल पर अचानक ही प्रणव तल्ख स्वर में बोल पड़ा।
“हाँ, मालूम तो करना ही है। वह अपना हम-जिगरी था। हम सब साथ में ढेरों मौज-मस्ती करते थे… और अब अचानक वह हमारे सामने लाश बनकर तैर रहा है, तो सवाल तो पूछूँगा ही।”
विप्लव ने सपाट स्वर में कहा।
बस फिर क्या था—प्रणव के भीतर जमा भय और क्रोध का मिश्रण सुनते ही उबल पड़ा।
“तो एक काम करो, तुम भी तालाब में कूद पड़ो और उसकी आत्मा के पास जाकर पूछ लो। उससे पूछना—और अगर वापस लौटने की संभावना हो, तो आकर हमें भी बता देना!”
उसने क्रोध में कहा और अपनी उबलती साँसों को नियंत्रित करने लगा।
दोनों के बीच बढ़ते विवाद को रोकने के लिए शिशिर झट बोल पड़ा—
“यार, तुम दोनों पागल हो गए हो क्या? अपना दोस्त तालाब में निष्प्राण पड़ा हुआ है और तुम दोनों आपस में झगड़ रहे हो!” एक पल रुककर उसने चारों की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा—
“दुख सिर्फ तुम दोनों को नहीं है। हमें भी है… और हम भी जानना चाहते हैं कि इसे किसने मारा है। इसलिए मैंने पुलिस को फोन कर दिया है।”
“कुछ ही देर में पुलिस पहुँच जाएगी। फिर पता चल जाएगा कि असल में क्या हुआ था।”
वह बोलता रहा।उसकी बात सुनते ही पाँचों के चेहरे और अधिक सफेद पड़ गए। भय शिशिर के भीतर भी था, लेकिन बाहर से वह हिम्मत दिखा रहा था।उसे याद था कि उसके पापा की शहर में कितनी इज्ज़त है—और फार्म हाउस पर हुई यह घटना उनके लिए गहरा आघात बन सकती थी। हो सकता है, वे उसी को इस मामले में दोषी समझ बैठें। वह उन्हें अच्छी तरह जानता था—वे ऐसी स्थिति का सदमे से सामना नहीं कर पाएँगे, जो उनके सम्मान को ठेस पहुँचाए।लेकिन अब क्या हो सकता था? घटना तो घट चुकी थी। उसे आने वाली परिस्थितियों का सामना करने के लिए खुद को मजबूत करना ही था।समय धीरे-धीरे आगे सरक रहा था। पाँचों की निगाह तालाब में तैरती लाश पर टिकी थी और उनके चेहरों पर बेचैनी की लकीरें और गहरी होती जा रही थीं।
वे पाँचों चिंतित थे। क्योंकि प्रितेश, जो कुछ ही देर पहले उनके साथ बैठा जाम टकरा रहा था, अब मारा जा चुका था। और यहाँ उन पाँचों तथा गेट पर मौजूद गनमैन के अलावा कोई दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसे में पुलिस सीधे-सीधे उन्हीं को अपराधी मानेगी। उन्हें टॉर्चर किया जाएगा—और हो सकता है, उनकी ही किसी से गुनाह कबूल करवाने की कोशिश की जाए।
घर्रर… घर्र…!
अचानक दूर कहीं से गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दी। पाँचों समझ गए—पुलिस आ गई थी।
वे पुलिस की अगवानी के लिए आगे बढ़ना चाहते थे, तभी गेट खुलने की आवाज आई और पल भर में पुलिस की स्कॉर्पियो आकर उनके सामने रुक गई। वे हतप्रभ से खड़े रह गए।गाड़ी रुकते ही इंस्पेक्टर विभूति ठाकुर उतरे—और पल भर में ही जिन्न की तरह उनके सामने खड़े होकर उनकी आँखों में अपनी तेज, पैनी निगाहें गड़ा दीं। वह निगाह—जो किसी के चेहरे का एक्स-रे कर मन की परतों तक झाँक लेने में माहिर थी।
विभूति ठाकुर—छः फुट लंबा, आकर्षक कद-काठी वाला युवक। घुँघराले काले बाल, चौड़ा ललाट, सुटी हुई ऊँची नाक, काली नुकीली आँखें, मोटी मूँछें और गौर वर्ण लिए गोल चेहरा। उम्र कोई सत्ताईस–अट्ठाईस के आसपास।और सबसे खास—उसके चेहरे पर मौजूद हमेशा की मुस्कान, जो किसी भी परिस्थिति में ग़ायब नहीं होती थी।वह मुस्कान अभी भी थी—और उसे देखकर पाँचों के चेहरे भय से और भी पीले पड़ गए।विभूति ठाकुर ने शांत स्वर में, आँखें उनकी आँखों में गड़ाए पूछा—
“तो आप लोगों में से किसने मुझे फोन किया था?”
“सर… मैंने फोन किया था…”
शिशिर हकलाते हुए बोला।उसी समय उनकी स्कॉर्पियो से सब-इंस्पेक्टर ललित सचान भी उतरकर उनके पास आ चुका था। विभूति ठाकुर उसी पूर्ववत ढंग से उसकी ओर मुड़े—
“सचान साहब! आप भी न… अभी तक इधर-उधर ही घूम रहे हैं! जाइए, लाश बाहर निकलवाइए।”
“जी सर! फोरेंसिक एक्सपर्ट और डॉग-स्क्वॉड की टीम बस पहुँचने ही वाली है। उनके आते ही लाश बाहर निकलवा लूँगा।”
“तो उनका फॉलो-अप लीजिए, पता कीजिए वे कहाँ पहुँचे हैं। जल्दी कीजिए।”
इंस्पेक्टर ने आदेश दिया।
और जैसे ही वह वापस उनकी ओर मुड़े—उसी क्षण शिशिर के चेहरे पर भय का रंग और गहरा हो गया।लेकिन वह जितना इंस्पेक्टर को देखकर नहीं चौंका था, उससे ज़्यादा चौंक गया गेट से अंदर प्रवेश करती एक स्कूटी को देखकर।
क्योंकि स्कूटी पर बैठकर जो आई थी, उसके आने की वह कल्पना भी नहीं कर सकता था।

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