आदत है मेरी

बड़ी ख़ामोशी से तुम्हें ताकने की आदत है मेरी
दर-ओ-दीवार से तुम्हें झाँकने की आदत है मेरी। 

अपनी सादगी से ख़रीद ली तूने मुस्कान मेरी
तेरी सादगी की क़ीमत आँकने की आदत है मेरी। 

मुझमें यह औक़ात नहीं जो छू सकूँ आसमान को
इसी धरा की ही धूल फाँकने की आदत है मेरी। 

तुमने कभी समझा नहीं मेरे जीने का सलीका
यह समझा, एक लाठी से हांकने की आदत है मेरी। 

“दिल एक को दो या नेक को”, यही सोचती हूँ मैं
ज़माने के ही पीछे नहीं भागने की आदत है मेरी। 

एक तेरे सिवा ज़माने में मैंने देखा नहीं किसी को
तेरी ही याद में सारी रात जागने की आदत है मेरी।