मदन मोहन 'मैत्रेय'
मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
लावण्य प्रेम (भाग-7)
वह नीले रंग की मारुति डिज़ायर, शाहदरा पुलिस स्टेशन से कुछ दूर आगे मुख्य सड़क के किनारे खड़ी थी। गाड़ी में बैठा विश्वांत बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। उसकी निगाह बार-बार कलाई घड़ी की ओर चली जाती थी। वैसे भी रात के दस बजने वाले थे, तो उसका बेचैन होना स्वाभाविक ही था, जो उसके चेहरे के हाव-भाव से साफ़ परिलक्षित हो रहा था।
वैसे तो उसने मालती को फोन कर दिया था। उसे जैसे ही मालूम हुआ था कि मालती शिशिर के फार्म हाउस पर गई थी और वहाँ से सीधा पुलिस स्टेशन पहुँच गई है, उसका मन घबरा उठा था। उसका मन इसलिए बेचैन था कि कहीं मालती किसी मुसीबत में न फँस जाए।वह मालती को दिलो-जान से चाहता था और उसके लिए अपनी पलकें बिछाने को तैयार रहता था। इस हादसे की जानकारी मिलने के बाद वह खुद को रोक नहीं सका और यहाँ तक खिंचा चला आया। हालाँकि, यहाँ पहुँचते ही उसने मालती को फोन किया था और उससे ही जानकारी मिली थी कि परेशानी की कोई बात नहीं है; बस पूछताछ पूरी हो गई है और वह बाहर निकल रही है।बस इतना सुनते ही उसने परम शांति का अनुभव किया था। अब पुलिस स्टेशन के अंदर जाने का कोई मतलब नहीं था, इसलिए उसने फैसला किया कि वह यहीं खड़ा रहकर उसका इंतज़ार करेगा। लेकिन मन में एक अनजानी आशंका भी थी कि—’अगर मालती ने उसकी भावनाओं को तरजीह नहीं दी तो?’
यह प्रश्न उसके लिए अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ था, क्योंकि मालती ने उसके प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में यह भी हो सकता था कि वह पुलिस स्टेशन से निकलने के बाद सीधे घर की ओर निकल जाए और उसकी इस मदद को इग्नोर (Ignore) कर दे।हो सकता था कि बात ऐसी ही हो, किंतु आखिरकार वह घर जाने के लिए गुज़रेगी तो इसी रास्ते से! बस इसी बात को लेकर वह आश्वस्त था। वैसे भी, आप जिसे चाहते हों, उसकी एक झलक भी देखने को मिल जाए, तो क्या कहने! बस इसीलिए अपनी कार यहाँ लगाकर वह इंतज़ार कर रहा था।
इंतज़ार के पल बहुत धीमे-धीमे बीतते हुए प्रतीत होते हैं। तभी तो कहा जाता है कि इंतज़ार करना संसार का सबसे दुष्कर कार्य है। इंतज़ार की बेचैनी कैसी होती है, यह सिर्फ इंतज़ार करने वाला ही जानता है। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी इंतज़ार के इस दंश को नहीं झेलना चाहती और तुरंत उतावली हो जाती है; उसके अंदर इतना धैर्य ही नहीं होता।किंतु विश्वांत के मामले में ऐसा कुछ नहीं था। वह आज की युवा पीढ़ी का होने के बावजूद बड़े धैर्य से इंतज़ार कर रहा था। हालाँकि, बीतते समय के साथ उसके चेहरे पर बेचैनी की परत गाढ़ी होती जा रही थी, जो बता रही थी कि उसका धैर्य कभी भी टूट सकता था।वह इस सत्य से भी वाकिफ था कि अगर उसने ज़रा सा भी उतावलापन दिखाया, तो निश्चित ही अपना नुकसान कर बैठेगा। इतने दिनों तक साथ रहने के बाद भी वह मालती को नहीं समझ सका था, थोड़ा भी नहीं समझ सका था। ऐसे में एक छोटी सी चूक और वह उससे हमेशा के लिए दूर हो सकती थी।
‘उफ़!… नहीं, कभी नहीं!’ इसके बाद होने वाली स्थिति से वह अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए इस तरह का जोखिम (Risk) वह फिलहाल नहीं उठाना चाहता था। वह पूरी तन्मयता के साथ उसका इंतज़ार कर रहा था। समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, उसकी निगाहें बार-बार घड़ी पर जा रही थीं और रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था, जिससे अब सड़क की हलचल भी धीमी होने लगी थी।समय बीतने के साथ शहर के भागने की रफ़्तार सुस्त पड़ रही थी। आखिरकार जब वह इस इंतज़ार से उकताने ही वाला था, तभी रियर-व्यू मिरर (Mirror) में मालती स्कूटी चलाती हुई आती दिखी। उसने कार का दरवाज़ा तेज़ी से खोला और बाहर निकलना ही चाहता था कि मालती उसके करीब पहुँच गई। उसने स्कूटी कार के पास रोकी और बोल पड़ी—
“विश्वांत!… तुम भी न, आखिर यहाँ तक आने की ज़रूरत क्या थी?”
“ज़रूरत तो नहीं थी, लेकिन जैसे ही मुझे पता चला कि तुम शिशिर के फार्म हाउस से पुलिस स्टेशन आई हो, मुझे लगा कि तुम किसी मुसीबत में फँस गई हो। बस, मैं अपने आप को रोक नहीं सका और सीधे यहाँ चला आया।” उसका प्रश्न सुनते ही विश्वांत तपाक से एक ही साँस में बोल गया और उसकी ओर देखने लगा। उसकी यह बात सुनकर मालती सहज भाव से बोली—
“तो क्या तुम मेरी पल-पल की खबर रखते हो?…”
सवाल कठिन था और अप्रत्याशित भी, इसलिए पल भर के लिए वह अकबका गया। फिर उसने खुद को संभाला, क्योंकि एक छोटी सी गलती संबंध बनने से पहले ही पूर्णविराम लगा सकती थी। इसलिए वह अपने शब्दों को तोल-तोलकर बोलने लगा—
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। और भला मैं तुम्हारे निजी जीवन में हस्तक्षेप क्यों करूँ, मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ। वह तो बस जानकारी मिली, तो मदद करने के उद्देश्य से चला आया।” उसने कहा और उसकी आँखों में देखने लगा, मानो उसके मन के भावों को पढ़ना चाहता हो। उसकी बात सुनकर मालती मुस्कुराई और धीरे से बोली—
“तुम भी न, मैं तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रही थी और तुम सीरियस (Serious) हो गए।” उसने रुककर विश्वांत की तरफ देखा। उसकी बात सुनकर विश्वांत ने राहत की सांस ली। तब वह आगे बोली, “खैर, अभी घर की ओर कार बढ़ाओ, रात गहरा रही है।”
यह कहकर उसने स्कूटी स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। तब विश्वांत ने भी कार स्टार्ट की और उसके पीछे-पीछे गाड़ी दौड़ाने लगा। कुछ देर तक दोनों कुछ फासले पर साथ-साथ चलते रहे, फिर अचानक स्कूटी की रफ़्तार तेज़ हुई और वह कुछ ही पलों में उसकी आँखों से ओझल हो गई।तब उसने सोचा कि ज़रूर उसे घर पहुँचने की जल्दी होगी, इसलिए वह किसी शॉर्टकट से निकल गई होगी। फिर क्या था, उसने भी कार की रफ़्तार बढ़ा दी। लेकिन यह क्या! पीछे से एक काले रंग की स्कॉर्पियो बहुत तेज़ी से आ रही थी, जो सीधे उसकी ही कार की सीध में थी। इसे देखकर विश्वांत की छठी इंद्री (Sixth Sense) ने उसे सावधान किया।उसे समझते देर नहीं लगी कि पीछे वाली कार के ड्राइवर का इरादा ठीक नहीं है। इसलिए वह संभलकर गाड़ी को सड़क के दूसरी ओर ले जाने के लिए स्टीयरिंग मोड़ने ही वाला था कि पिछली कार ने उसकी गाड़ी को ज़ोरदार टक्कर मार दी! टक्कर इतनी भीषण थी कि उसकी कार हवा में उछली और सड़क पर पलटती हुई सीधे जाकर डिवाइडर से टकरा गई।
धड़ाम!…
एक तेज धमाका हुआ, जो दूर तक गूँजता चला गया। इस हादसे के कारण सड़क पर चल रही गाड़ियों की रफ़्तार थम सी गई थी। टक्कर वाकई भयावह थी, जिसके प्रभाव से हमलावर कार (स्कॉर्पियो) भी सड़क पर वृत्ताकार घूम गई। लेकिन उसका ड्राइवर कोई मँजा हुआ खिलाड़ी लगता था; उसने तुरंत कार को संभाला, उसे सीधा किया और सड़क पर गाड़ी भगाता हुआ रफूचक्कर हो गया।
