अब प्रतिवाद कहाँ है शिव नारायण बाजारों की रौनक में जनवाद कहाँ हैलोगों की उस महफ़िल में संवाद कहाँ है।तुम भी खुश हो मैं भी खुश हूँ इस मौसम मेंगाँव नगर में अब कोई अवसाद कहाँ है।आज बयानों में कहती यह रोज सियासतइस मौसम में अब कोई उन्माद कहाँ है।दुनिया के लोगों में इतनी दहशत फैलीहर कोई अब खुद में भी आजाद कहाँ है।भाई, तो इतना बतला दो ‘शिव’ को भी यहजुल्मों के हिस्से में अब प्रतिवाद कहाँ है।