मदन मोहन 'मैत्रेय'
मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
लावण्य प्रेम (भाग-1)
मालती!… सच-सच बतलाना, तुम मेरे सपनों को सजाने के लिए साथ दोगी न? — पूछा विश्वांत ने। फिर अपनी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं। शायद उसके मन के भावों को पढ़ना चाहता था, परंतु उसे इसमें सफलता नहीं मिली। विश्वांत, जो प्रेम की पगडंडी पर अपने कदम बढ़ाने के लिए आतुर था — यह उसकी नजरों से स्पष्ट झलक रहा था। वह मालती के लिए एकतरफा प्रेम महसूस करता था। परंतु… इस तरह कब तक चलता? कब तक वह एकतरफा प्रेम में डूबकर मन में उसकी तस्वीर सजाता रहता? आखिर इस तरह तो बात नहीं बनने वाली थी। इसलिए उसने अपने इश्क का इज़हार करने का फैसला कर लिया और पुस्तकालय में आ पहुँचा, जहाँ मालती अकेली बैठी हुई पुस्तक के पन्नों को पलट रही थी।
परिस्थितियाँ अनुकूल थीं, क्योंकि वहाँ उन दोनों के अलावा कोई नहीं था। उसने अपने अंदर हौसला जुटाया, इज़हार के बाद होने वाली सकारात्मक और नकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए खुद को तैयार कर लिया और उसके करीब पहुँच कर बिना लाग-लपेट के प्रेम-प्रस्ताव रख दिया। फिर उत्तर की आशा में उसके चेहरे को देखने लगा।
उधर, पुस्तक के पन्नों में खोई मालती ने जब करीब आते हुए कदमों की आहट सुनी, तो चौंक उठी और जब तक संभल पाती, आश्चर्य का दूसरा प्रहार उसके ऊपर हुआ, क्योंकि विश्वांत ने उसके सामने प्रेम-प्रस्ताव रख दिया था। ऐसे में वह एक पल के लिए हतप्रभ-सी बन गई। विश्वांत सुंदर था—उसके घुँघराले बाल, नीली आँखें, ऊँची भौहें, गौर वर्ण लिए गोल चेहरा, गढ़ा हुआ शरीर और चौड़ा सीना। सब कुछ था उसके पास, जो वह अपने सपनों के राजकुमार में चाहती थी। किंतु अभी तक उसने इस बारे में सोचा ही नहीं था, या यूँ कहें कि फिलहाल उसकी रुचि इस ओर थी ही नहीं।
वैसे भी उसे अपने रूप-लावण्य पर गर्व था। वह पूरे कॉलेज में ‘तितली’ के नाम से मशहूर थी। बिल्कुल अप्सरा मेनका की तरह सुंदर। उसके कटीले नैन, जो किसी को भी एक ही वार में घायल कर देने की ताकत रखते थे। उसके घुटनों तक लटकते हुए काले बाल, जो साँप-से बनकर न जाने कितने आशिकों के हृदय पर लोट जाते। उसका रूप-माधुर्य ऐसा था कि कॉलेज का हर लड़का उसमें गोते खाने के लिए बेचैन रहता। उसका छलकता यौवन, जिसे उसके आशिक छलकते हुए मदिरा-घट जैसा मानते थे—पूरी तरह मादक।
ऐसे में उसके मन में यह बात सदा रहती थी कि फिलहाल उसे किसी एक का नहीं होना है। हाँ, उसे बहुत आनंद आता था जब कोई उसे चाहत भरी नजरों से देखता। जब वह पास से गुजरती तो लोग ठंडी आहें भरकर रह जाते।
किन्तु आज अचानक विश्वांत ने आकर उसकी इच्छाओं पर विराम लगाने की कोशिश की थी। ऐसे में आश्चर्य का झटका लगना स्वाभाविक था। उसने अपनी निगाहें उसकी आँखों में डालीं और खुद को संभालते हुए बोली—
“क्या कहा तुमने?… मैंने ठीक से सुना नहीं, या समझो, फिर से सुनना चाहती हूँ। अपनी बात दुहराओ।”
विश्वांत उसकी बात सुनकर संभला और उसके करीब बेंच पर बैठ गया। फिर हिम्मत जुटाकर बोला—
“मालती!… तुमने जो सुना, वह एक-एक शब्द सच है। हाँ, मैं अब तुम्हारे संग जीवन की पगडंडियों पर चलना चाहता हूँ, जहाँ हम दोनों मिलकर विभिन्न रंगों से सपने बुनेंगे।”
“परंतु… इसके लिए मेरी सहमति भी तो ज़रूरी है।” — उसकी बात सुनते ही मालती बोली और उसकी आँखों में गहराई से झाँकने लगी। ऐसे में विश्वांत एक पल के लिए अकबका गया। उसे समझ ही नहीं आया कि अब क्या कहे, क्योंकि यह नाजुक पल था। कोई भी गलत शब्द मामले को खत्म कर सकता था और उसकी प्रेम-कहानी यहीं बंद हो जाती।
उसका कोमल मन ‘इनकार’ जैसे शब्द को सुनने के लिए कतई तैयार नहीं था। वह तो मालती को अपने हृदय के मंदिर में कब का बसा चुका था और सच्चे भाव से उसकी प्रेम-आराधना करता था। तभी संयमित होकर बोला—
“सच है, तुम अगर इनकार कर दो, तो मेरे सपने अधूरे रह जाएंगे। वे सपने, जो मैंने तुम्हारे संग बुनने हैं। फिर तो मैं बिल्कुल ही कोरे कागज की तरह रह जाऊँगा।”
उसकी मासूमियत भरी बात सुनकर मालती अचंभित रह गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि आगे क्या बोले। मामला गंभीर था। सीधे-सीधे इनकार करना भी आसान नहीं था, क्योंकि विश्वांत में कोई कमी भी नहीं थी। उसने करीब आकर उसके कोमल भावों को छू लिया था।
मालती, जो अब तक एकांत भाव में ही रमी रहती थी, आज पहली बार यह अनुभव कर रही थी कि हाँ, उसे भी प्रेम के आलंबन की आवश्यकता है। किंतु इतने भर से वह तुरंत प्रेम-निमंत्रण स्वीकार कर ले, यह उचित नहीं था। किसी को अपनाने से पहले विश्वास और मन की भावनाओं का जुड़ना जरूरी है।
बस कोई आकर प्रेम का इज़हार कर दे और उसे स्वीकार कर लेना इतना सहज नहीं होता। प्रेम के लिए प्राथमिकता समर्पण है और समर्पण ही वह आधार-स्तंभ है, जिसके सहारे प्रेम पनपता है। इसलिए उसने मुस्कराकर उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोली—
“अगर बुरा न मानो, तो हम लोग कॉलेज कैंटीन चलते हैं। वहीं साथ बैठेंगे, कॉफी की चुस्की लेंगे और ढेर सारी बातें करेंगे। क्या बोलते हो, चलोगे?”
उसकी बात सुनकर विश्वांत उत्साहित हो बोला—
“हाँ, क्यों नहीं?… वैसे भी समझता हूँ, मैंने जो प्रस्ताव दिया है, उसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं है। तुम लाजवाब हो, तुम्हारे विचार श्रेष्ठ हैं, आचरण अच्छा है। इसीलिए भावनाएँ न होते हुए भी तुमने मुझे आहत करने वाली प्रतिक्रिया नहीं दी। ऐसे में साथ बैठने और कॉफी पीने का प्रस्ताव मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।”
यह सुनकर मालती मुस्करा दी, कोई उत्तर नहीं दिया। वह अपनी जगह से उठी, पुस्तक को शोकैस में रखा और पुस्तकालय से बाहर निकल गई। विश्वांत उसका अनुसरण करता हुआ कैंटीन पहुँचा। दोनों कोने वाली टेबल पर बैठ गए।
मालती ने कैंटीन में काम कर रहे एक लड़के को इशारे से बुलाकर दो कप गरमा-गरम कॉफी मँगाई और फिर विश्वांत की ओर देखने लगी। ऐसे में विश्वांत एक पल के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। उसे समझ नहीं आया कि संवाद को आगे कैसे बढ़ाए।
मालती ने उसके मन के भाव पढ़ लिए। तभी शांत स्वर में बोली—
“देखो विश्वांत!… तुमने जो प्रेम-प्रस्ताव दिया है, उसे स्वीकारना आसान नहीं और सीधे इनकार कर देना भी उचित नहीं। इसलिए सही होगा कि हम दोनों कुछ दिन साथ में समय बिताएँ, एक-दूसरे को समझें और फिर किसी निर्णय पर पहुँचें। बोलो, क्या कहते हो?”
विश्वांत ने उत्तर तो नहीं दिया, लेकिन सहमति में सिर हिलाया। दोनों के चेहरे पर सौम्य मुस्कान खिल उठी। तभी कैंटीन में आलोक वैष्णव ने कदम रखा, जो इसी कॉलेज का छात्र था। उसे देखते ही दोनों पल भर को बेचैन हो गए।
वह बंगला भव्य और विशाल तो नहीं था, किन्तु साधारण भी नहीं था। दरअसल, उसे फार्महाउस कहा जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि वहाँ फार्महाउस जैसी तमाम सुविधाएँ मौजूद थीं। साथ ही वह शहर से दूर, एक वीरान इलाके में बना हुआ था, जो चारों तरफ ऊँची बाउंड्री वाल से घिरा हुआ था।
गेट पर मुस्तैदी से खड़े दो गनमैन अपनी निगाहें चारों ओर घुमाकर उस बंगले की निगरानी कर रहे थे। बाउंड्री वाल के अंदर एक ओर सुंदर स्विमिंग पूल था, दूसरी ओर रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ, और पीछे की ओर आम का घना बगीचा। बीच में खड़ा था वह तीन मंज़िला बंगला — शायद उसे कुछ पल शांति से बिताने के लिए बनवाया गया था, और यही हो भी रहा था।
बंगले के भीतर, हॉल में इस समय पाँचों लड़के आराम से बैठे हुए थे। पाँचों ही आकर्षक व्यक्तित्व वाले थे, जिनका वेशभूषा बताती थी कि वे किसी अमीर परिवार का प्रतिनिधित्व करते थे। उनकी आँखों में अपने धन-संपत्ति और सामाजिक ताकत का गुरूर साफ झलकता था। किन्तु इस समय उनके चेहरों पर एक अजीब-सी शांति थी।
उनके हाव-भाव से नहीं लगता था कि उन्हें किसी बात की जल्दी हो। वे निश्चिंत थे — क्योंकि इस बंगले के मालिक शिशिर ने ही उन्हें बुलाया था। और वे सब जानते थे कि शिशिर वादे का पक्का है; उसने अगर किसी बात की हामी भर दी, तो उसे पूरा करने के लिए वह पूरी ताकत झोंक देगा।
लेकिन जिसने उन्हें बुलाया था, वही अब तक नदारद था। ऐसे में उनकी निगाहें बार-बार बंगले के गेट की ओर उठ जाती थीं। धीरे-धीरे आगे बढ़ती घड़ी की सुई और शिशिर के न आने से उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। तभी उनमें से एक लड़का — प्रणव — बाकी चारों की ओर देखकर बोला,
“यार प्रितेश!… लगता है शिशिर के लिए समय का कोई मूल्य नहीं है।”
प्रितेश, जो उसकी बात सुनकर थोड़ा चौंक उठा था, बोला —
“ऐसा तुम किन तथ्यों पर कह रहे हो? आखिर कहना क्या चाहते हो, स्पष्ट कहो। इस तरह से बातों को घुमा-फिराकर कहोगे, तो मैं कुछ नहीं समझ पाऊँगा।”
प्रणव हल्के से मुस्कराया, फिर गंभीर होकर बोला —
“यार, उसने क्या कहकर हमें बुलाया था?… यही न, कि मेरे फार्महाउस पर जल्द से जल्द पहुँचो। मैं भी वहीं आ रहा हूँ। वहाँ पहुँचकर ही हमारी बातें होंगी और पार्टी भी करेंगे।
बस, श्रीमान का हुक्म हुआ और हम सब दौड़े-दौड़े आ गए। हमें यहाँ आए हुए घंटे भर से ज़्यादा हो गया, पर बुलाने वाले महाशय का तो अब तक अता-पता नहीं!”
तभी तीसरा लड़का विप्लव बोल पड़ा —
“हां, तुम्हारी बात सोलह आने सच है। उसने कहा और हम लोग दौड़कर आ गए, लेकिन खुद ही अब तक नहीं पहुँचा। इससे साफ़ है कि उसकी नज़रों में समय का कोई मूल्य नहीं।”
वह इतना ही कह पाया था कि तभी बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज़ गूँजी। जिन चेहरों पर कुछ क्षण पहले तक नाराज़गी झलक रही थी, वे चेहरे अब खिल उठे। क्योंकि वे समझ गए — अब शायद शिशिर ही आया होगा।
हुआ भी वही। पाँच मिनट बाद ही बड़ा-सा थैला उठाए हुए शिशिर ने गेट से प्रवेश किया और सीधे उनकी ओर बढ़ा।
शिशिर का शरीर गठीला था; झील-सी नीली आँखें, घुंघराले काले बाल, चौड़ा ललाट और गौर वर्ण वाला गोल चेहरा — और उस पर उसकी चिर-परिचित मुस्कान।
आते ही उसने सबकी ओर देखकर सधे हुए स्वर में कहा —
“प्रिय मित्रों! जानता हूँ, मैं देर से आया हूँ और आप लोग पहले से पधार चुके होंगे। इंतज़ार करना हमारे खून में नहीं, और हम टीन-एज हैं — तो किसी का भी इंतज़ार हमें रास नहीं आता। फिर भी आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी…”
वह कुछ पल रुका, सबकी आँखों में देखा, फिर मुस्कराकर बोला —
“जानता हूँ, आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आगे क्या करेंगे। तो बता दूँ — अभी हम लोग ज़ोरदार पार्टी करेंगे और उस घमंडी लड़की के लिए आपस में एक ‘अलिखित अनुबंध’ करेंगे।”
“क्या?” — प्रणव आश्चर्य से बोल पड़ा।
वह कुछ देर तक शिशिर के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता रहा, फिर बोला —
“यार शिशिर!… तुम बातों को इतनी गोल-गोल क्यों घुमा रहे हो? साफ़-साफ़ बताओ, आगे क्या प्लानिंग की है?”
शिशिर मुस्कराया —
“हाँ, प्लानिंग तो की है, और उसी कारण तुम सबको बुलाया है। लेकिन अपनी बात बताने से पहले पार्टी की तैयारी कर लेते हैं। फिर जाम टकराएँगे और उसी दौरान उस विषय पर भी चर्चा करेंगे, जिसके लिए हम सब यहाँ इकट्ठा हुए हैं।”
“तुम भी न यार!… बिना मतलब की भूमिका बाँध रहे हो,” प्रितेश झुंझलाया। “अरे बताओ भी, हम लोगों को क्यों बुलाया है? पार्टी तो होती रहेगी।”
पर उसकी बातों का शिशिर पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने साथ लाए थैले को उठाता है, सबके चेहरों पर जिज्ञासा और बेचैनी देखता है, हल्का मुस्कराता है और सीधे किचन की ओर बढ़ जाता है।
