आस लगाए बैठे हैं

याद नहीं कब से हम
तेरे इंतजार में दर
पे आस लगाए बैठे हैं।
बस एक तुम्हारे दीदार के लिए ही
हम महफ़िल सजाए बैठे हैं।
कभी तेरा ये नज़र-ओ-करम
इस कनीज की रूह पे पड़ जाए,
न हो रोशनी की कमी
इसीलिए चिराग
दिल का जलाए बैठे हैं।