क्यों तड़पती मैं सारी रात

क्यों तड़पती मैं सारी रात तुमसे मुलाकात न होता
तेरा गठीला बदन से रूबरू गर इत्तेफाक न होता।

मैं भी जी लेती बिंदास जिंदगी सोती चैन की नींद
अगर मेरी इन पलकों में तेरा कोई ख्वाब न होता।

तुमने अपनी आँखों में सुनहरा सा पहना जो ऐनक
तुम्हें देख तुमको पाने की चाहत बेहिसाब न होता।

न तड़पता बेचारा दिल न बेबस आँखें आँसू बहाती
न मरती तेरे इश्क में जिंदगी में तेरा आगाज़ न होता।

मैं ख्वाहिश ही क्यों करती तेरा दिल की निगाहों से,
लोगों को अपना बनाने का हुनर लाजवाब न होता।