जब ख़्वाबों ने रातभर

जब ख्वाबों ने रातभर दिल का साथ निभाया नहीं तो डर कैसा,
जब इश्क की राहों में काटें न मिले फिर इश्क का सफर कैसा।

जेठ की चिलमिलाती धूप की सफर में गर कही ठहरना जो पड़े
जिनकी छांव में बैठने से दिल को सुकून न मिले वो सफ़र कैसा,

जिंदगी के सफर में न जाने, कैसे कैसे लोगों से मिलना होता है
जो निगाह अपने और पराए को पहचान न सके वो नज़र कैसा।

वो परेशान रहें जिसने फूलों की सेज में अपना वक्त बिताया हो
कंटीली राहों में चलने वालों को छोटी आंधियों का फिकर कैसा।