मैं जो कभी रूठ जाऊँ

मैं जो कभी रूठ जाऊँ तो कभी तुम भी रूठ जाना,
पहले मैं तुम्हें मनाऊँ पर बाद में तुम भी मुझे मनाना।

छोटी सी जिंदगी है मत रखना कभी दिल में नफरत,
ग़म हो या फिर खुशी में मिलने का ढूंढें कोई बहाना।

जिसे खुद समझते हो अपना, तो एहसास है ग़मों का
जो निगाहें को भी पढ़ न सके, उसे कैसे कहें दीवाना।

एक तू मेरे जीने का आसरा हो, नहीं दूजा जिंदगी में,
तेरे बगैर मैं जी न सकूँगी चाहे कुछ भी कहे ज़माना।

मिलन की ख्वाहिश हो दिल में गुरेज़ कभी न करना,
खामोश रहके भी बेचारे दिल को अच्छा नहीं सताना।