डर है कहीं
न कर आस कभी आसमाँ से प्यार की सौगात का
कैसे भरोसा कर सकता है बिन बादल बरसात का।
वादा करना, उनसे मुकरना सियासत की ये रस्में हैं
क्यों भरोसा करता है तू ‘फेंकू नंबर वन’ की बात का।
बंद कमरे में क्या करते हैं शायद हमको पता नहीं
इनकी नज़रों में कोई मोल नहीं हमारे जज्बात का।
अब नहीं डरेंगे और आख़िर क्यों नहीं सवाल करेंगे
56″ सीना है तो जवाब दें नरवणे की किताब का।
बुरे वक्त में रशिया ने साथ दिया, उनसे मुँह मोड़ लिया
जिसने गद्दारी की उसे भरोसेमंद बना लिया अपने हाथ का।
ऐसा तो नहीं कि ट्रंप कोई गोपनीय राज़ जानता है
या डर है कहीं एपस्टीन फाइल खुलने के राज़ का।
