यूं मौन रहो जो तुम !

यूं मौन रहो जो तुम !
थम जाएगी नदियों की धारा
बदलेंगे रूख गगन में बादल भी
ना आएंगे नील गगन में तारा
हे मृदुभाषिनी अब बोल भी दो
होंठों पर पड़े ताले खोल भी दो।

यूं मौन रहो जो तुम !

बादल भी गरजना भूल पड़े
मेरे अरमानों पर बरछी शूल पड़े
मेरे अँखियन में भय के धूल पड़े
सच कहें हम प्रेम की पाती भूल पड़े
हे प्राण प्रिये अपनी वाणी बोल भी दो
होंठों पर पड़े ताले खोल भी दो।

यूं मौन रहो जो तुम!

मेरा तो होली जले सजे अरमानों की
यूं तुम जो देख रही अंजानो सी
मेरी हालत ऐसी है दीवानों सी
जो प्रिय तेरी सांस चले तूफानों सी
मुझपे प्रिय प्रेम पतीला यूं ढोल भी दो
होंठों पर परे ताले खोल भी दो।

यूं मौन रहो जो तुम !

सजदे में हूं तुम्हारे प्राण प्रिये !
तेरे लिये अपने हथेली जान लिये
तुम्हें मनाने को प्रण ठान लिये
कदमों में तेरे मान लिये-सम्मान लिये
मेरे मन में तुम वाणी के रस घोल भी दो
होंठों पर परे ताले खोल भी दो।

यूं मौन रहो जो तुम!