उम्मीद से दिये की लौ जलाया भी था

उम्मीद से दिये की लौ जलाया भी था
तेरे पास आकर मैं मुस्कराया भी था
कहीं जिन्दगी तेरे कदमों में छाया भी था
कि कई ऐसी बातें तुमको सुनाया भी था।

तुम समझते नहीं, गैर तुम तो नही
अदावत में रहते, खैर तुम तो नही
पता ही नही राह में क्या-क्या हुआ
जख्म दिल के अपने तुमको दिखाया भी था।

हम परेशान होकर तुम्हारे लिए, बस तुम्हारे लिए
ढलते गए, बदलते गए, बस तुम्हारे लिए
पलकों पर कहूं कैसे, क्यों नींद आती नही
बस इस बात पर तुमको मिलने बुलाया भी था।

अगर आज कह दूं राज हो गया है बयां
ओ जिन्दगी मैं हूं सफर में, तुम हो कहां
समझ लो जरा, तुम जो अब तक थे समझे नही
थे तुम नींद में, मैंने पास आकर जगाया भी था।

अदावत का क्या, फिर से कर लेना कभी
जब मैं अकेला रहूं, तुम जख्म देना तभी
धूँ-धूँ के जलता है मेरा उम्मीदों का शहर
जिसे तुमने संग मेरे मिलकर सजाया भी था।