इतिहास का वो पन्ना कोरा क्यों कर है
इतिहास का वो पन्ना कोरा क्यों कर है
क्या कहता है कहीं है राज छिपा
कैसे कह दूं कितनों का है आवाज छिपा
इसके परतों में है कितनों का ताज छिपा
कितने ही शहजादे का मुमताज छिपा
कैसे पता करूँ, इसका पन्ना थोड़ा क्यों कर है।
क्यों कर है इसके जज्बात अलग-अलग
है जीत अलग और जीवन की हार अलग
कुछ द्वादश बिंदु पर है इसके तो भाग अलग
इसके पन्नों पर है वीरों का श्रृंगार अलग
इसके लफ्जों में कितने महलों का सरताज छिपा
हमें जरा बता दो, इसने पन्नों को खाली छोड़ा क्यों कर है।
कहीं वीर की परिभाषा उपमानों में दी जाती है
कहीं तो हैवानों की तुलना इंसानों से की जाती है
क्योंकर सत्य-असत्य में है रेखा खिंची-खिची
फिर तो क्योंकर मानवता की पूजा शैतानों में की जाती है
देख भी लूँ, कही कल के पन्नों में हो आज छिपा
हमें जरा समझा दोगे, कल से आज किनारा क्यों कर है।
