स्वभाव

स्वभाव का सार तत्व यही तो है,
अपने सम भाव से जीवन जी लो।
मिले हलाहल विष पीने को, पी लो,
अपने दुख दुविधा का नाम नहीं लो।

समभाव से बढते पथ पर गीत सुनाओ,
जीवन संध्या ढलने से पहले पर्णकुटी छवाओ।

मानो या ना मानो, जीवन है गुरु द्वारा,
नियम में रहकर देखो, बंधो नियमों के द्वारा।
तुम कुंदन सा तप कर बन पाओगे तारा,
फिर इच्छित तेरा होगा, जीवन की बहती धारा।

अब तो आगे निकल चुके हो, अनुभव जरा बताओ,
कहीं थके तो कहाँ रुकोगे, पहले पर्णकुटी छवाओ।।

माना कि तुमने वेदों से महती ज्ञान पढा है,
माना यह भी, तुमने जीवन का अनुमान पढा है।
समझ लिया यह भी, ऋषियों का ध्यान पढा है,
माना तुमने जीवन जीने का अनुसंधान पढा है।

इतना मर्मज्ञ हुए हो, जीवन की रीति बुझाओ।
तुम आने वाले तूफान से पहले, पर्णकुटी छवाओ।।

माना कि तुमको अनुभव है, अपने जीवन बल का,
पर कहाँ भरोसा रहता, आते समय के छल का।
कहाँ तोड़ मिल पाया, इस समय के प्रति बल का,
तुम थोड़ा सा आयोजन कर लो, आने वाले कल का।

अभी तो समय है, संभलो अपनी महता नहीं भुलाओ,
कहीं घटित ना अनहोनी, पहले पर्णकुटी छवाओ।।

किंचित अब तुम समझ सको तो, स्वभाव को समझो,
उचित यही होगा, चलते जीवन के दाँव को समझो।
वांछित है यह सत्य, हृदय के मूल भाव को समझो,
अनुचित होने से पहले ही, समय प्रभाव को समझो।

जो सत्य है कर्म पथ का कर्तव्य, तुम तो सही निभाओ।
व्यर्थ का भ्रम क्यों पाल रहे, पहले पर्णकुटी छवाओ।।