माँ भारती
हे माँ भारती, माँ भारती, माँ भारती
गौरवमय स्वर्णिम थाल से करूँ आरती।
तू जननी जन्म भूमि, गुंजित स्वर है,
है तू ममता मयी, तू करुणा मयी तरूवर है।
अखण्ड रूप तेरा निर्मल, श्वेत वस्त्र धरे।
तेरा वंदन कर लूँ, जीवन धन्य हो मेरा भारती।।
तेरे गौरवमय अतीत को गौरव से गाऊँ,
है धवल वस्त्र तेरे, तेरे रुप को ध्याऊँ।
गर्भित सार तत्व वेदों का, तेरे कण-कण में पाऊँ,
हम भारत के वासी, माँ तेरा लाल कहाऊँ।
जब क्रुद्ध होती हो तुम, कर त्रिशूल धरे।
तेरे रज-कण के चंदन से, जीवन धन्य हो मेरा भारती।।
अभिमानित हो मैं जाऊँ, तू वस्त्र जो पहने धानी,
स्वर तेरे गुंजित है माँ, वेदों की निर्मल वाणी।
तेरे चरण प्रछालन का गौरव सागर लेते हैं,
विंध्य हिमाचल का मुकुट सिर तेरे महारानी।
शुभ्र नालंदा की घाटी में तू माता निवास करें,
तेरे यशोगान में लीन रहूँ, जीवन धन्य हो मेरा भारती।।
ज्ञान धरा-अभिमान धरा, तेरे चरण समर्पित होऊँ,
हे भारती ! सिंह वाहिनी, अभिलाषा है तुम पर अर्पित होऊँ।
और बची अभिलाषा मन की, चरण तेरे मैं धोऊँ,
तेरे रज-कण में लोटूँ, भारती तेरे रज-कण में सोऊँ।
ज्ञान खान तू धरा भूमि, हृदय मेरे उल्लास भरे।
माँ तेरा अभिनंदन कर लूँ, जीवन धन्य हो मेरा भारती।।
तेरा बीता अतीत का गौरव, सागर चरण प्रछाल करें,
तुंग हिमालय की चोटी, मुकुट मणि तेरे भाल धरे।
मुक्ता मणि से शोभित माते, गले तेरे वनमाल धरे,
तेरे चरण कमल में पुण्य प्रसून, हम तेरे लाल धरे।
तेरे यशोगान को मुक्त कंठ हो गाऊँ, मन अभिलाष धरे।
तेरे रज-कण का चंदन कर लूँ, जीवन धन्य हो मेरा भारती।।
