हे पार्थ !

हे पार्थ !
करने को जीवन का पुरुषार्थ,
संभव हो तो तज देना, अपना स्वार्थ।
आहत मत होना शब्दों के चलते बाणों से,
विचलित मत होना, कायरता के घावों से।
जीत का निर्णय तय है, केशव साथ खड़े हैं।
तुम तो धनुष उठाओ, अब तो बाण चढाओ।।

माना कि रण है, नियम नहीं निभाए जाएंगे।
प्रतिद्वंद्वी बन कर कौरव, तेरे सामने आएंगे।
तुम ऊहापोह में उलझे, वे बरछी तीर चलाएंगे।
पर संशय है व्यर्थ, रण कभी जीत नहीं पाएंगे।
तुम किंचित सोचो, अभी तक तेरे घाव हरे है।
केशव तेरा बना सारथी, रथ पर तो चढ़ जाओ।।

क्यों उत्सुक हो अपने पन में, नहीं इसका छोर मिलेगा।
जितना चाहे जतन करोगे, नहीं इसका ओर मिलेगा।
द्वंद्व बढेगा अंतर मन में, कहीं पार्थ उलझ न जाओ।
इन रिश्तों के धागों को मत खींचो, यह कमजोर मिलेगा।
माना भी हे पार्थ ! तेरे मन के महतम भाव बड़े हैं,
यह समर भूमि है रण करने को, किंचित उद्वेग न लाओ।।

अभिलाषा अभी तो मत कर लो, भीषण युद्ध मचेगा।
तुम जो बंधे नैतिक मूल्यों से, तेरे विरूद्ध मचेगा।
फिर तो संभल ना पाओ पार्थ, पथ अवरूद्ध लगेगा।
तुम कायरता को छोड़ो, रण है नहीं नीति प्रबुद्ध लगेगा।
अभी से विकल मत होना, अभी नहीं जख्म भरे हैं।
हृदय को मुक्त करो तो, तनिक रथ पर चढ भी जाओ।।

हे पार्थ समझ लो, जीवन का पुरुषार्थ यही है।
रण है भीषण पाप-धर्म का, समझो यथार्थ यही है।
लड़ना ही वीरों का है सत्कर्म, परमार्थ यही है।
कौरव-पांडव का रण निश्चय, होना चरितार्थ यही है।
जो कल तक कहलाते थे अजय, रण में आज मरे है।
हे वीर-धीर हे पार्थ ! दुर्जय,तुम तो नियम भूल भी जाओ।।