क्यों है घबराता

उत्क्रमित हो अभिमान, बनती है धग-धग ज्वाला।
कहना तो अतिरंजित होगा, बनती विष का प्याला।
नहीं रहता है सत्य का भान, धूमिल होता है ज्ञान।
मानव होकर होता मानवता से दूर, बना अंजान।
जीवन का लेशमात्र नहीं चिन्ता, अपना गाल बजाता।
समय के बीते पथ पर, वो फिर क्यों है घबराता ।।

कभी-कभी तो आभास करें, जीवन का एहसास करें।
अपनी छवि बनाए पटल पर, लंबी-लंबी सांस भरे।
है तो महज इंसान, पर स्वर्णिम महलों की ही बात करें।
पथ पर काफिला निकल गए, वो गफलत में रात करें।
उलझा-उलझा वो है, बस उलझे हुए बात सुनाता।
आहट जब होता कदमों की, वो फिर क्यों है घबराता ।।

पटल पर चित्र अलग है, उसकी तो बस बात न पूछो।
रात अभी-अभी आई है, अँधियारे की हालात न पूछो।
वो जीवन का चित्र बनाए, बस उसका करामात न पूछो।
उन्मादित कहीं न हो जाए, आई है ऐसी रात न पूछो।
नर्तक बन अभिलाषाओं का, अन-सुलझे स्वांग रचाता।
समय की ठोकर कठोर है जैसे, वो फिर क्यों है घबराता ।।

अभी तो कहना मुमकिन है, कहीं वो संभल भी पाएगा।
अँधियारे मन के आंगन में, किंचित तो दीप जलाएगा।
जीवन की गलियां महकाने को, किंचित बाग लगाएगा।
उत्क्रमित हुई अभिमान के लय से किंचित बच जाएगा।
मोह पाश आशाओं का लेकर, वो आगे कदम बढाता।
उफान मारती जीवन की लहरें, वो फिर क्यों है घबराता ।।

उत्क्रमित हुआ अभिमान, कुंद हुई ज्ञान की धारा।
धन का वैभव, तन का वैभव, घोषित है उसके द्वारा।
अहो ! दूर-दूर तक रात कालिमा, नहीं आसमान में तारा।
अमृत स्वाद कहाँ से समझे, जब विष पी लिया हो सारा।
अपनी करनी का भान नहीं जो, होंठों पर मकरंद सजाता।
उन्मत हो ज्ञान की खोज है करता, वो फिर क्यों है घबराता ॥