संशय की गुच्छ लता
संशय की गुच्छ लता, उलटी जीवन धारा।
आसमान का रिक्त है आँचल, कहाँ गए सब तारा।
रात कालिमा आने को उत्सुक, फैला है अँधियारा।
मूल प्रश्न फिर उठता है, हल होगा किसके द्वारा।
उचित नहीं है ज्ञान, वो कैसा व्यवहार करेगा।
फिर वो बना विकल इंसान, क्या श्रृंगार करेगा।।
वो धीर-वीर नहीं है, बोलो धैर्य कहाँ से लाए।
जीवन का व्यापार अलग, बोलो कैसे मोल चुकाए।
जीवन ज्ञान का भान नहीं, बोलो कैसे राह बनाए।
अँधियारा को हरने को तो बोलो, कैसे दीप जलाए।
कहाँ मिलेगी सीख उसे, जो खुद को तैयार करेगा।
लड़ लेगा रण अपने अनुभव से, वीरों सा वार करेगा।।
नव युग है यह, नवीन गुणों को उलझन में उलझाए।
नवल-नवल बिंदु को लेकर, फिर भी समझ न आए।
जीवन की दुविधा यही सही है, राह नजर नहीं आए।
नये नियमों को समग्र भाव से बोलो कौन बताए।
कहाँ अभी वह निपुण हुआ है, जीवन से रार करेगा।
संयमित होकर बढ़ पाएगा, पथ पर अधिकार करेगा।।
तरूँ लता जो उलझी जीवन की, नव कपोल खिलेगा कैसे।
सुषुप्त हुई जीवन परिभाषा, पथ पर थाह मिलेगा कैसे।
उन्मुक्त हुआ है वो अभी, बोलो तो राह मिलेगा कैसे।
फिर जो वो सम्हल न पाए, सब कुछ सम तोल मिलेगा कैसे।
अभी तो ज्ञान पुंज से अनभिज्ञ है, कैसे प्रतिकार करेगा।
कैसे संभव होगा पथ पर, वो कार्य रीति अनुसार करेगा।।
विदित हो संशय की गुच्छ लता, बनी तो बनी है कैसे।
अंतर्हित होकर बैठा है, हृदय में यह द्वंद्व ठनी है कैसे।
जीवन से कल तक हिला मिला था, फांद बढ़ी है कैसे।
वह तो अंतर्हित था मनोभाव से, अनुबंध हटी है कैसे।
जब घायल होगा विदित नहीं है, कैसे उपचार करेगा।
तत्पर होगा रण लड़ने को, वीर हो भीषण प्रहार करेगा।
