पपीहे का संकल्प

बड़ा बावला है तू पपीहा,
ये कैसी है जिद कर ठानी?
वर्ष भर रह जाता प्यासा,
स्वाति बूंद से प्यास बुझानी।

नीर सभी तो प्यास बुझाते,
चहुं ओर पानी ही पानी।
इंतज़ार में बैठा प्यासा,
कर बैठा ना तू नादानी!

विकल्प नहीं जहां संकल्प है,
संशय नहीं जहां प्रेम- निश्चल है।
स्वाति बूंद से प्यास बुझाना,
हठ नहीं यह मेरा निश्चय है।

ना बूझेगी उम्मीद की लौ,
चाहे विकल्प मिले कई और।
नीरस्रोत मिले चहुं ओर,
स्वाति ही प्यास बुझाए मोर।

ना हठ है ना मनमानी,
समझ चाहे मेरी नादानी।
मर जाऊंगा मैं तो प्यासा,
अगर यही मेरी जिंदगानी।

ना नैनो में भरी निराशा,
प्यास बुझेगी मन में आशा।
अटूट विश्वास की परिभाषा,
अंबर निहारे पपीहा प्यासा।

एक टक निहारे गगन,
अपने ही धुन में था मगन।
उम्मीद भरे उसके नयन,
हाय !कैसी लगी ये लगन।

छा गई घटा घनघोर,
स्वाति- बूंद जमीं की ओर।
गिरा पपीहे के कण्ठ में जाकर,
तृप्त हुआ वो प्यास बुझाकर।

घुमड़ -घुमड़ कर बरसा पानी,
देखी अद्भुत यह प्रेम कहानी।
अनुपम था ये मिलन,
भर आए मेरे भी नयन।