अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
दो बूँदें
जयशंकर प्रसाद शरद का सुंदर नीलाकाशनिशा निखरी, था निर्मल हासबह रही छाया पथ में स्वच्छसुधा सरिता लेती उच्छ्वासपुलक कर लगी देखने धराप्रकृति भी सकी न आँखें मूँदसु शीतलकारी शशि आयासुधा
अरे कहीं देखा है तुमने
जयशंकर प्रसाद अरे कहीं देखा है तुमनेमुझे प्यार करने वाले को ?मेरी आँखों में आकर फिरआँसू बन ढरने वाले को ? सूने नभ में आग जलाकरयह सुवर्ण-सा हृदय गला करजीवन
सब जीवन बीता जाता है
जयशंकर प्रसाद सब जीवन बीता जाता हैधूप छाँह के खेल सदॄशसब जीवन बीता जाता है। समय भागता है प्रतिक्षण में,नव-अतीत के तुषार-कण में,हमें लगा कर भविष्य-रण में,आप कहाँ छिप जाता




