अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
शिव नारायण छवियाँ केवल जड़ मूर्त ही नहीं होतींउनमें भावनाओं का ज्वार औरसंवेदनाओं का संग्राम भी होता है! जन्म के सात-आठ महीने बाद हीमाँ चल बसी थी और साथ मेंमुझसे
शिव नारायण पर्वत अडिग खड़ा रहा, झरना रिस रिस जाय। किसन बंशी टेर रहे, राधा लपकी जाय॥ निज मेरा खुल रहा, साथी तेरे पास। जीवन उसका धन्य है, साथी जिसके
शिव नारायण जब जब मैं गिरातब तब तुम हंसे, उठा, उठने लगातुम आक्रामक हुए, तन कर खड़ा हुआतुम कहर बरपाने लगेऔर अब-जब हंस रहा हूँतो तुम रिरियाने लगे हो..! ओ
शिव नारायण मन संशय में बह रहा, तन चूर हो तनाव। रब जाने क्या हो यहाँ, पार हो न हो नाव॥ जीने का मकसद नहीं, संभ्रम में रह कैद। बंधन
शिव नारायण लू की आंधी चल रही, धरती का संताप। पसीने में डूबे सभी, जले भुने तन आप॥ शुरू होते ही नौतपा, पारा पचास पार। ग्रीष्म आग बरसा रहा, शहर
शिव नारायण बाजारों की रौनक में जनवाद कहाँ हैलोगों की उस महफ़िल में संवाद कहाँ है। तुम भी खुश हो मैं भी खुश हूँ इस मौसम मेंगाँव नगर में अब




