अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ कविताएँ ले लो कविताएँसुनो सखी,क्या तुम सचमुच कविताएँ बेच रही हो?हाँ दो कविताएँ हैं मेरे पास।एक जीवन की,और एक मृत्यु की।बताओ,तुम्हें कौन-सी चाहिए? मुझे जीवन की कविता
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ कौन सी साड़ी पहनूंउन दिनोंमेरे पास केवल यही विकल्प थे।घर की देहरी से बाहरसंसार का कोई रंगमेरे हिस्से नहीं आता था।मुझे चुनना थाबसलाल, हरा या नीला,जबकि मेरे
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ अपराजितायह केवल अक्षरों का संयोजन नहीं,यह उन रातों की राख से जन्मा नाम हैजहाँ मैं हर दिनथोड़ा-थोड़ा जलती रहीऔर फिर भीभोर की तरह लौटती रही।यह नाम मैंनेकिसी
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ उस दिनजब गांधारी नेअपनी आँखों पर पट्टी बाँधी थी,केवल एक स्त्री नेअपने नेत्र नहीं ढँके थेएक युग नेअपनी चेतना परअंधकार का वस्त्र ओढ़ लिया था। वह चाहती
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ आजएक नदी कोअपने ही तट पर बैठकर रोते देखा हैउसकी आँखों मेंकाई नहीं,सभ्यता का धुआँ तैर रहा था।वनों की देह परलोहे के नाखूनों से लिखे गएविकास के
सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ कौन कहता हैमैं शिला थी?मैं तो केवलएक बहुत लम्बी पीड़ा थीजिसे युगों नेधरती पर रख छोड़ा था। मेरे भीतर भीएक नदी बहती थीनीरव,जैसे संध्या के आँचल मेंदबा




