अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
ससुर जी उवाच
डॉ अशोक चक्रधर डरते झिझकतेसहमते सकुचातेहम अपने होने वालेससुर जी के पास आए,बहुत कुछ कहना चाहते थेपर कुछ बोल ही नहीं पाए। वे धीरज बँधाते हुए बोले-बोलो!अरे, मुँह तो खोलो।
नया आदमी
डॉ अशोक चक्रधर डॉक्टर बोला-दूसरों की तरहक्यों नहीं जीते हो,इतनी क्यों पीते हो? वे बोले-मैं तो दूसरों से भीअच्छी तरह जीता हूँ,सिर्फ़ एक पैग पीता हूँ।एक पैग लेते हीमैं नया
सिक्के की औक़ात
डॉ अशोक चक्रधर एक बारबरखुरदार!एक रुपए के सिक्के,और पाँच पैसे के सिक्के में,लड़ाई हो गई,पर्स के अंदरहाथापाई हो गई।जब पाँच का सिक्कादनदना गयातो रुपया झनझना गयापिद्दी न पिद्दी की दुमअपने




