अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।

यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य  को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।

अहिल्या

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ कौन कहता हैमैं शिला थी?मैं तो केवलएक बहुत लम्बी पीड़ा थीजिसे युगों नेधरती पर रख छोड़ा था। मेरे भीतर भीएक नदी बहती थीनीरव,जैसे संध्या के आँचल मेंदबा

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मैं स्वयं गीता हूँ

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ सभा के मध्यआज भी एक वस्त्रअनंत होता जाता है,और सभ्यताअपने शास्त्रों की स्वर्ण-मुद्राएँआँखों पर रखकरधर्म का जयघोष करती रहती है।उधरकिसी एकांत अंतःपुर मेंएक स्त्रीअपने ही प्रश्नों की

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राजा तानाशाह

शिव नारायण जितना चाहे फेंक दो, फेंक सके तो फेंक। फेंक अगर सत्ता मिले, फेंक फेंक दिल सेंक॥ गैस में है आग लगी, दुनिया बेपरवाह। तुम भी केवल फेंकते, जनता

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नगर नगर ऐलान

शिव नारायण सच बात बेधड़क कहे, ऐसा ना अखबार। चरण सत्ता लोट रहे, तथ्य तोड़ हर बार॥ खबरों की कारीगरी, कर रहे पत्रकार। हित में पूंजी तंत्र के, काम करे

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प्रेम यही संसार

शिव नारायण अस्पताल सबसे बड़ा, है भीड़ बेशुमार। बड़े बड़े सब जन यहाँ, दौड़ भाग लाचार। धनकुबेर सब पंक्ति में, शून्य लगे खामोश। जाने क्या पल में घटे, सोच सभी

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संत वही है एक

शिव नारायण अपेक्षा जो करे नहीं, होता नहीं निराश। फल हमेशा मिले उसे, खुशियाँ जीवन पास॥ दूर तलक लख रोशनी, तम का कहीं न वास। सकारात्मक सोच रखे, रह जीवन

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