
बाबा नागार्जुन
जीवन परिचय
बाबा नागार्जुन का जन्म 11 जून 1911 को बिहार राज्य के मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में उनके ननिहाल में हुआ था। उनका जन्म नाम वैद्यनाथ मिश्र था। चार संतानें पूर्व में असमय काल कवलित हो चुकी थीं, इसलिए उनका जन्म एक विशेष कृपा माना गया। उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माता का नाम श्रीमती उमादेवी था। जब बाबा केवल चार वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया, जिससे उनके बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
चपन में ही उन्हें संस्कृत शिक्षा की ओर प्रवृत्त किया गया। उन्होंने तरौनी, गनौली और पचगछिया की पाठशालाओं से क्रमशः संस्कृत की प्रारंभिक परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। इसके बाद उन्होंने काशी में अध्ययन कर ‘आचार्य’ की उपाधि प्राप्त की। 1926 में कलकत्ता में ‘काव्यतीर्थ’ और ‘साहित्य शास्त्राचार्य’ की उपाधियाँ प्राप्त कीं। बाद में श्रीलंका जाकर पाली भाषा एवं बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया। यहीं उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और ‘नागार्जुन’ नाम धारण किया।
1931 में उनका विवाह हीरपुर बवशी टोल निवासी कृष्णकांत झा की पुत्री अपराजिता देवी से हुआ। विवाह के समय उनके पास आजीविका का कोई निश्चित साधन नहीं था। कई वर्षों तक पत्नी मायके में रहीं। 1943 में नागार्जुन पुनः अपने गांव तरौनी लौटे, जहाँ अपराजिता देवी स्थायी रूप से रहने लगीं। उनके पुत्र शोभाकांत मिश्र ने अपने संस्मरणों में पारिवारिक जीवन की गहराई से चर्चा की है।
नागार्जुन का जीवन अत्यंत सादा, किन्तु भीतर से संघर्षशील और विद्रोही था। वे खादी पहनते थे, चप्पल पहनते थे और एक झोले में पूरा जीवन समेटे रखते थे। जीवन की मस्ती, पीड़ितों के प्रति करुणा, सत्ता के प्रति विरोध और निर्भीक विचारधारा उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ थीं। वे यायावर प्रवृत्ति के थे और आमजन से गहराई से जुड़े हुए थे।
साहित्यिक यात्रा-
नागार्जुन हिंदी साहित्य के बहुचर्चित और बहुआयामी लेखक थे। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध, नाटक, जीवनी, अनुवाद, बाल साहित्य आदि सभी विधाओं में लेखन किया। वे हिन्दी, मैथिली, संस्कृत, बंगला आदि भाषाओं में सृजन करते थे।
प्रमुख उपनाम-
- मैथिली में : यात्री
- हिन्दी में : नागार्जुन
- संस्कृत में : चाणक्य
- मित्रों में : नागाबाबा
साहित्यिक कृतियाँ
काव्य संग्रह (हिन्दी)
युगधारा (1953), सतरंगे पंखोवाली (1959), प्यासी पथराई आँखें (1962), तालाब की मछलियाँ (1974), खिचड़ी विप्लव देखा हमने (1980), पुरानी जूतियों का कोरस (1983), हजार-हजार बाहोंवाली (1981), ऐसे भी हम क्या! (1985), आख़िर ऐसा क्या कह दिया मैंने? (1986), इस गुब्बारे की छाया में (1990), भूल जाओ पुराने सपने (1994)
खण्ड काव्य
भष्मांकुर (1971), रत्नगर्भ (1987)
उपन्यास
रतिनाथ की चाची (1948), बलचनमा (1952), नई पौध (1953), बाबा बटेसरनाथ (1954), जमनिया का बाबा (1955), दुखमोचन (1957), वरुण के बेटे (1957), कुम्भीपाक (1960), हीरक जयंती (1961), उग्रतारा (1963), इमरतिया (1968), पारो (1975), गरीबदास (1989)
कहानी संग्रह
आसमान में चन्दा तैरे (1982) – इसमें असमर्थदाता, ममता, ताप-हारिणी, विषमज्वर, मनोरंजन टैक्स आदि कहानियाँ सम्मिलित हैं।
निबंध
उन्होंने लगभग 56 निबंध लिखे, जो ‘नागार्जुन रत्नावली’ (भाग-6) में संकलित हैं। प्रमुख निबंध हैं – मृत्युंजय तुलसीदास, प्रेमचंद: एक व्यक्तित्व, अन्नहीनम् क्रियाहीनम्, वंदे मातरम आदि।
नाटक
अनुकंपा, निर्णय
जीवनी लेखन
निराला पर आधारित ‘एक व्यक्ति : एक युग’ शीर्षक से जीवनी लिखी।
अनुवाद
गीत गोविंद (जयदेव), मेघदूत (कालिदास), पृथ्वी वल्लभ (के.एम. मुंशी), विद्यापति के सौ गीत आदि का हिन्दी में अनुवाद किया।
बहुभाषीय सृजन
मैथिली साहित्य
मैथिली उपन्यास : पारो, बलचनमा, नवतुरिया
मैथिली काव्य संग्रह : चित्रा (1949), पत्रहीन नग्न गाछ (1967)
संस्कृत साहित्य
देश दशकम्, कृषक दशकम्, श्रमिक दशकम्, धर्मलोक शतकम्
बंगला साहित्य
उन्होंने 1978–1979 में बंगला में 41 कविताएं लिखीं, जो ‘मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा’ नामक द्विभाषी संग्रह में प्रकाशित हुईं।
बाल साहित्य
कथामंजरी, रामायण की कथा, वीर विक्रम, सयानी कोयल, अनोखा टापू, तीन अहदी
पुरस्कार और सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969, मैथिली काव्य – पत्रहीन नग्न गाछ)
- भारत भारती पुरस्कार (1987)
- बिहार रत्न सम्मान (1987)
- मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार (1989)
- साहित्य अकादमी फेलोशिप
- उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार से नकद सम्मान (1982)
- कुरतूक-एन-हैदर ट्रस्ट एवं अन्य संस्थानों से सम्मान
लंबी बीमारी के पश्चात बाबा नागार्जुन का निधन 5 नवम्बर 1998 को हुआ। उनके निधन पर सम्पूर्ण साहित्य जगत शोकाकुल हुआ। डॉ. नामवर सिंह ने उन्हें ‘क्रोध की करुणा का कवि’ कहा।
