अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
हिमाद्रि तुंग शृंग से
जयशंकर प्रसाद हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारतीस्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’ असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण
बीती विभावरी जाग री
जयशंकर प्रसाद बीती विभावरी जाग री!अम्बर पनघट में डुबो रहीतारा-घट ऊषा नागरी! खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहाकिसलय का अंचल डोल रहालो यह लतिका भी भर लाई-मधु मुकुल नवल रस गागरी अधरों
उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर
जयशंकर प्रसाद उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर!करुणा की नव अँगराई-सी, मलयानिल की परछाईं-सी,इस सूखे तट पर छिटक छहर! शीतल कोमल चिर कंपन-सी,दुर्ललित हठीले बचपन-सी, तू लौट कहाँ जाती है री—यह




