अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
अब जागो जीवन के प्रभात
जयशंकर प्रसाद अब जागो जीवन के प्रभात!वसुधा पर ओस बने बिखरे हिमकन आँसू जो क्षोभ भरेऊषा बटोरती अरुण गात! अब जागो जीवन के प्रभात!तम-नयनों की ताराएँ सब— मुँद रही किरण
निवेदन
जयशंकर प्रसाद तेरा प्रेम हलाहल प्यारे, अब तो सुख से पीते हैं।विरह सुधा से बचे हुए हैं, मरने को हम जीते हैं॥ दौड़-दौड़ कर थका हुआ है, पड़ कर प्रेम-पिपासा
आह ! वेदना मिली विदाई
जयशंकर प्रसाद आह! वेदना मिली विदाईमैंने भ्रमवश जीवन संचित,मधुकरियों की भीख लुटाई। छलछल थे संध्या के श्रमकणआँसू-से गिरते थे प्रतिक्षणमेरी यात्रा पर लेती थीनीरवता अनंत अँगड़ाई। श्रमित स्वप्न की मधुमाया




