अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।

यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य  को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।

सुबह-सुबह

बाबा नागार्जुन सुबह-सुबहतालाब के दो फेरे लगाए सुबह-सुबहरात्रि शेष की भीगी दूबों परनंगे पाँव चहलकदमी की सुबह-सुबहहाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुएमाघ की कड़ी सर्दी के मारे सुबह-सुबहअधसूखी पतइयों का कौड़ा तापाआम

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चंदू, मैंने सपना देखा

बाबा नागार्जुन चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटाचंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा। चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबूचंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद

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सुन रहा हूँ 

बाबा नागार्जुन सुन रहा हूँपहर-भर सेअनुरणन —मालवाही खच्चरों की घण्टियों केनिरन्तर यहटिलिङ्-टिङ् टिङ्टिङ्-टिङा-टङ्-टाङ् !सुन रहा हूँ अनुरणन !और सब सोए हुए हैंउमा, सोमू, बसन्ती, शेखर, कमल… सभी तो सोए पड़े

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