अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।
यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।
घिन तो नहीं आती है
बाबा नागार्जुन पूरी स्पीड में है ट्रामखाती है दचके पै दचकेसटता है बदन से बदनपसीने से लथपथ ।छूती है निगाहों कोकत्थई दांतों की मोटी मुस्कानबेतरतीब मूँछों की थिरकनसच सच बतलाओघिन
सोनिया समन्दर
बाबा नागार्जुन सामनेलहराता हैजहाँ तक नज़र जाती है,सोनिया समन्दर ! बिछा है मैदान मेंसोन ही सोनासोना ही सोनासोना ही सोना गेहूँ की पकी फसलें तैयार हैं–बुला रही हैंखेतिहरों को…”ले चलो
घन-कुरंग
बाबा नागार्जुन नभ में चौकडियाँ भरें भलेशिशु घन-कुरंगखिलवाड़ देर तक करें भलेशिशु घन-कुरंगलो, आपस में गुथ गए खूबशिशु घन-कुरंगलो, घटा जल में गए डूबशिशु घन-कुरंगलो, बूंदें पडने लगीं, वाहशिशु घन-कुरंगलो,




